
जोहार की गूंज से गूंजा गारू: सरना सरहुल में उमड़ा जनसैलाब,परंपरा और प्रकृति का भव्य उत्सव
गारु :जिले के गारू प्रखंड में इस वर्ष सरना सरहुल का पर्व पूरे उत्साह, श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया गया।आदिवासी समाज का यह प्रमुख त्योहार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार, सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक पहचान का सशक्त प्रतीक बनकर सामने आया। सुबह से ही सरना स्थल और खेल मैदान की ओर जाने वाले रास्तों पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। पारंपरिक वेशभूषा में सजे स्त्री-पुरुष, सिर पर सखुआ फूल और हाथों में ढोल-मांदर की थाप के साथ नृत्य करते हुए आगे बढ़ रहे थे। हर उम्र के लोगों में सरहुल का उल्लास साफ झलक रहा था।कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में रेंजर उमेश दुबे, जिला परिषद सदस्य जीरा देवी, सरना समिति की बरखा देवी सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। मंच पर पहुंचते ही अतिथियों का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया। नन्हीं बच्चियों द्वारा प्रस्तुत स्वागत गीत और “जोहार-जोहार” की गूंज ने पूरे माहौल को भावुक और जीवंत बना दिया।अतिथियों ने बच्चों की प्रस्तुति की सराहना करते हुए इसे संस्कृति की मजबूती का प्रतीक बताया।सरहुल पूजा का मुख्य अनुष्ठान पाहन द्वारा सखुआ वृक्ष के नीचे संपन्न हुआ। विधिवत पूजा अर्चना कर अच्छी वर्षा, समृद्ध खेती और समाज में सुख-शांति की कामना की गई। इसके बाद पारंपरिक नृत्य और गीतों का सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें महिलाओं ने समूह बनाकर मनोहारी नृत्य प्रस्तुत किया, वहीं पुरुष मांदर और ढोल की थाप से पूरे वातावरण को ऊर्जावान बनाते रहे। बच्चों की भागीदारी ने कार्यक्रम में और भी रंग भर दिया।पूरे आयोजन को सफल बनाने में सरना समिति की अहम भूमिका रही। समिति द्वारा जलपान, पेयजल और प्रसाद की बेहतर व्यवस्था की गई, जिससे दूर-दराज से आए लोगों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं हुई। यह व्यवस्था सरहुल के सामूहिक और सहयोगी स्वरूप को दर्शाती रही।सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद नजर आया। गारू थाना प्रभारी जयप्रकाश शर्मा के नेतृत्व में पुलिस बल की तैनाती की गई थी। भीड़ नियंत्रण और यातायात व्यवस्था सुचारू रही, जिससे कार्यक्रम शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ।इस अवसर पर उमेश दुबे ने पर्यावरण संरक्षण और जंगलों की सुरक्षा का संदेश दिया, वहीं जीरा देवी ने महिलाओं की भागीदारी और समाज की एकता की सराहना की। गारू का यह सरहुल उत्सव न सिर्फ परंपरा का उत्सव बना, बल्कि यह सामाजिक समरसता, संस्कृति और प्रकृति प्रेम का जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत कर गया।




