
एक सप्ताह के लिए ‘विधवा’ बनी बीडी रेलखंड की पटरियां, हजारों यात्री बेहाल
आखिर जनता के दर्द पर किसने साध ली चुप्पी ?
डॉ. सत्येंद्र कुमार चंदेल

हुसैनाबाद : पलामू:बरवाडीह–डेहरी ऑन सोन (बीडी) रेलखंड पर नॉन-इंटरलॉकिंग कार्य के कारण आज से अगले पांच-छह दिनों तक सभी यात्री ट्रेनों की आवाजाही पूरी तरह बंद हो गई है। इसके साथ ही पलामू जिले का उत्तरी क्षेत्र, हुसैनाबाद, हैदरनगर, मोहम्मदगंज,ऊंटारी रोड और आसपास के दर्जनों गांव—व्यवहारिक रूप से जिला मुख्यालय मेदिनीनगर तथा प्रमंडलीय मुख्यालय से कट गया है। हजारों यात्रियों की दिनचर्या अस्त-व्यस्त हो गई है, लेकिन हैरत की बात यह है कि इस गंभीर संकट पर न तो रेलवे प्रशासन कोई वैकल्पिक व्यवस्था कर पाया और न ही जनप्रतिनिधियों की ओर से कोई ठोस पहल दिखाई दे रही है।
रेलवे के एक प्रशासनिक निर्णय ने पूरे क्षेत्र को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है, जहां लोगों के सामने रोजमर्रा की आवश्यकताओं से लेकर सामाजिक और कानूनी दायित्वों तक का संकट खड़ा हो गया है। किसी के घर शादी है, किसी को कोर्ट में पेशी पर जाना है, कोई नौकरी के लिए बाहर निकलना चाहता है तो कोई लंबी यात्रा कर अपने घर लौट रहा है। बाहर से आने वाले यात्री डेहरी ऑन सोन स्टेशन पर उतरकर अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए भटक रहे हैं। वहीं स्थानीय लोग सड़क मार्ग की महंगी और सीमित सुविधाओं के भरोसे रहने को मजबूर हैं।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जपला से डालटनगंज तक बस किराया 150 रुपये तक पहुंच चुका है, जो सामान्य रेल किराये की तुलना में कई गुना अधिक है। बसों की संख्या भी यात्रियों की जरूरत के अनुरूप नहीं है। नतीजा यह है कि यात्रियों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है और अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी झेलना पड़ रहा है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब समाधान मौजूद था तो उस पर पहल क्यों नहीं हुई? स्थानीय लोगों का सुझाव था कि बरवाडीह से डेहरी ऑन सोन के बीच चलने वाली शटल और जीडीआर ट्रेनों का अस्थायी विस्तार डालटनगंज तक कर दिया जाए। इससे रद्द ट्रेनों से प्रभावित हजारों यात्रियों को राहत मिल सकती थी और उत्तरी पलामू का रेल संपर्क भी पूरी तरह नहीं टूटता। लेकिन न तो रेलवे प्रशासन ने इस विकल्प पर गंभीरता दिखाई और न ही क्षेत्र के प्रभावशाली जनप्रतिनिधियों ने इस मांग को मजबूती से उठाया।क्या यही है मोदी के 12 साल, बेमिसाल? क्षेत्र के लोग यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि चुनाव के समय जनता की हर समस्या का समाधान करने का दावा करने वाले खादीधारी नेता और स्वयंभू समाजसेवी आखिर इस संकट की घड़ी में कहां हैं? हजारों लोग परेशानी झेल रहे हैं, लेकिन किसी की आवाज दिल्ली, रांची या रेल मुख्यालय तक पहुंचती दिखाई नहीं दे रही। जनता को यह महसूस होने लगा है कि चुनावी मंचों पर किए गए वादे और जनता की वास्तविक समस्याओं के बीच बहुत बड़ा अंतर है। लोगों का कहना है कि वे पांच-छह दिन की परेशानी भी झेल लेंगे, क्योंकि मजबूरी में जनता हर कठिनाई सहना सीख चुकी है। लेकिन उनके मन में यह कसक जरूर रहेगी कि जब बीडी रेलखंड एक सप्ताह के लिए ‘विधवा लाइन’ बन गया था, तब उसके विलाप को सुनने और आंसू पोंछने वाला कोई क्यों नहीं था? आखिर जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की संवेदनाएं किस मोड़ पर जाकर थम गईं? अब क्षेत्र की निगाहें पलामू के सांसद वी.डी. राम और रेलवे प्रशासन पर टिकी हैं। लोगों की मांग है कि तत्काल प्रभाव से वैकल्पिक रेल सेवा, शटल ट्रेन विस्तार अथवा विशेष लोकल ट्रेनों की व्यवस्था की जाए, ताकि हजारों यात्रियों को राहत मिल सके। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि जब व्यावहारिक विकल्प मौजूद था तो उसे लागू करने की पहल क्यों नहीं की गई।जनता आज केवल सुविधा नहीं मांग रही, बल्कि जवाब भी मांग रही है। सवाल सीधा है कि पूरा उत्तरी पलामू रेल संपर्क से कट रहा था, तब जनता की आवाज उठाने वाले लोग आखिर मौन क्यों थे? यही वह यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर क्षेत्र की जनता जानना चाहती है।


