
दमदमी माइंस हादसा: 15 दिन बाद भी कार्रवाई शून्य, क्या खनन माफियाओं के सामने बेबस है प्रशासन ?
डॉ. सत्येंद्र कुमार चंदेल
हुसैनाबाद(पलामू ) : हुसैनाबाद के दमदमी माइंस में 3 जून को जलभराव वाले खनन गड्ढे में डूबने से युवक लवकुश कुमार की दर्दनाक मौत को 15 दिन से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब तक न किसी दोषी माइंस संचालक की गिरफ्तारी हुई है और न ही किसी स्तर पर ठोस कार्रवाई दिखाई दे रही है। इस मामले ने न केवल जिला प्रशासन और खनन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि कानून के समान अनुपालन और प्रशासनिक जवाबदेही को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
मौत के गड्ढे बने अवैध खनन क्षेत्र
ग्रामीणों का आरोप है कि खनन कार्य के बाद बने गहरे और जलभराव वाले गड्ढों को न तो भरा गया और न ही उनकी घेराबंदी की गई। घटनास्थल पर चेतावनी बोर्ड, सुरक्षा बैरिकेडिंग और निगरानी व्यवस्था का भी अभाव था। ऐसे में ये परित्यक्त खनन गड्ढे अब स्थानीय लोगों के लिए “मौत के कुंड” बन चुके हैं।हादसे के बाद अंचल अधिकारी पंकज कुमार द्वारा माइंस संचालकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई, लेकिन 15 दिन बीत जाने के बावजूद पुलिस की कार्रवाई शून्य बनी हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि न किसी संचालक से पूछताछ हुई और न ही किसी को गिरफ्तार किया गया।

कार्रवाई में दोहरा मापदंड ?
दमदमी पहाड़ बचाओ संघर्ष मोर्चा और स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि जब माइंस क्षेत्र में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन किया गया, तब मुखिया पति समेत 10 लोगों के खिलाफ त्वरित प्राथमिकी दर्ज हुई और तीन लोगों को जेल भेज दिया गया। वहीं, एक युवक की मौत के मामले में सरकारी अधिकारी द्वारा दर्ज प्राथमिकी के बावजूद जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं होना कई सवाल खड़े करता है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कानून का पैमाना आम नागरिकों और प्रभावशाली खनन संचालकों के लिए अलग-अलग है?
खनन विभाग और डीजीएमएस की चुप्पी पर सवाल
खनन सुरक्षा मानकों की अनदेखी से हुई मौत के मामलों में तकनीकी जांच और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करना प्राथमिक कार्रवाई मानी जाती है। इसके बावजूद जिला खनन विभाग और खान सुरक्षा महानिदेशालय (डीजीएमएस) की टीम अब तक घटनास्थल का निरीक्षण करने नहीं पहुंची है।इस देरी ने खनन विभाग की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आखिर सुरक्षा मानकों की निगरानी करने वाली एजेंसियां इस मामले में मौन क्यों हैं?
एनजीटी पहुंचा मामला, पूर्व मंत्री ने उठाए सवाल
सोहया पहाड़ी में कथित अवैध खनन, पर्यावरणीय क्षति और सुरक्षा मानकों की अनदेखी के मुद्दे को झारखंड के पूर्व मंत्री एवं पूर्व विधायक कमलेश कुमार सिंह ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के समक्ष उठाया है। उन्होंने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने और जांच पूरी होने तक खनन गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग की है।पूर्व मंत्री का आरोप है कि कई खनन पट्टों की अवधि समाप्त होने के बाद भी कथित रूप से उत्खनन जारी है। बंद लीज क्षेत्रों में भी विस्फोटक सामग्री ले जाने वाले वाहनों की आवाजाही की शिकायतें मिल रही हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में अवैध खनन के नेटवर्क पर सवाल उठ रहे हैं।
न्याय के लिए भटक रहा परिवार
मृतक लवकुश कुमार के पिता सतेंद्र प्रसाद और चाचा सुकेन्द्र साहू का कहना है कि परिवार को अब तक न तो किसी तरह की प्रशासनिक सहायता मिली है और न ही कार्रवाई की कोई स्पष्ट जानकारी दी गई है। न्याय की उम्मीद में परिजन लगातार अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं।एक परिवार अपने बेटे को खो चुका है, लेकिन जिम्मेदारों की पहचान और जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया अब भी अधर में लटकी हुई है।
प्रशासन के सामने 6 बड़े सवाल
1. प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद अब तक किसी संचालक की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई?
2. खनन गड्ढों की घेराबंदी और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी?
3. जिला खनन विभाग और डीजीएमएस की जांच टीम घटनास्थल पर अब तक क्यों नहीं पहुंची ?
4. आंदोलनकारियों पर त्वरित कार्रवाई और मौत के जिम्मेदारों पर नरमी क्यों?
5. क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई ठोस कार्ययोजना बनाई गई है?
6. अब कार्रवाई नहीं हुई तो और कितनी जानें जाएंगी?
लवकुश कुमार की मौत केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि खनन सुरक्षा मानकों की अनदेखी, प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही के संकट का प्रतीक बन गई है।यदि समय रहते दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, खनन गड्ढों की घेराबंदी नहीं की गई और अवैध खनन पर सख्ती नहीं बरती गई, तो ऐसे हादसे आगे भी होते रहेंगे।अब निगाहें जिला प्रशासन, पुलिस, खनन विभाग और एनजीटी की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। सवाल सिर्फ एक परिवार को न्याय दिलाने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि किसी और घर का चिराग ऐसी लापरवाही की भेंट न चढ़े।


