पलामू में धूमधाम से मनाई गई विश्वकर्मा पूजा
Palamu : शिल्प देवता भगवान विश्वकर्मा भगवान की पूजा बुधवार को पूरे जिले में श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाई गई।विभिन्न प्रतिष्ठानों,कल कारखानों से लेकर छोटे-बड़े दुकानों व गैराजों में भगवान विश्वकर्मा की प्रतिष्ठापना कर विधिवत पूजा अर्चना की गई। विभिन्न संयंत्रों के संचालकों ने श्रद्धापूर्वक हवन पूजन किया। साथ ही शिल्पदेवता से आशीर्वाद मांगा।

पूजा को ले सुबह से ही तैयारी शुरू हो गई थी।पूजा पंडालों को आकर्षक ढंग से सजाया गया था। वही श्रद्धालुओं ने शिल्प देवता से आशीर्वाद मांगा। पूजा पंडालों को आकर्षक ढंग से सजाया गया। ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर भक्ति गीतों से क्षेत्र गूंजता रहा। देर तक पूजा अर्चना का क्रम जारी रहा। भगवान के दर्शनार्थ लोग पूजा पंडालों में घूमते नजर आए। शहर के गैरेजों, आरा मिलों, संयंत्र, विद्युत विभाग, दुकानों समेत रेलवे विभाग के विभिन्न कार्यालयों में विश्वकर्मा पूजा की धूम रही। डालटनगंज रेलवे स्टेशन परिसर स्थित कर्षण वितरण विभाग, वरीय अनुभाग अभियंता सेतु, अनुभाग अभियंता, भंडार, कर्मशाला, सूक्ष्म तरंग केंद्र, टेंपो स्टेंड ,समेत जिले के विभिन्न प्रखंडों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा आराधना की गई।
इधर पलामू के जिले के सभी प्रखंडों में भी विश्वकर्मा पूजा हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।जानकारों के अनुसार भगवान विश्वकर्मा की जयंती वर्षाऋतु के अंत और शरदऋतु के शुरू में मनाए जाने की परंपरा रही है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इसी दिन सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं। चूंकि सूर्य की गति अंग्रेजी तारीख से संबंधित है, इसलिए कन्या संक्रांति भी प्रतिवर्ष 17 सितंबर को पड़ती है। जैसे मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही पड़ती है। ठीक उसी प्रकार कन्या संक्रांति भी प्राय: 17 सितंबर को ही पड़ती है। इसलिए विश्वकर्मा जयंती भी 17 सितंबर को ही मनाई जाती है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में जितनी राजधानियां थीं, प्राय: सभी विश्वकर्मा की ही बनाई कही जाती हैं।
यहां तक कि सतयुग का ‘स्वर्ग लोक’, त्रेता युग की ‘लंका’, द्वापर की ‘द्वारिका’ और कलयुग का ‘हस्तिनापुर’ आदि विश्वकर्मा रचित ही थे। ‘सुदामापुरी’ की तत्क्षण रचना के बारे में भी यह कहा जाता है कि उसके निर्माता भी विश्वकर्मा थे। इससे यह आशय लगाया जाता है कि धन-धान्य और सुख-समृद्धि की अभिलाषा रखने वाले पुरुषों को बाबा विश्वकर्मा की पूजा करना आवश्यक और मंगलदायी है। विश्वकर्मा को देवताओं के शिल्पी के रूप में विशिष्ट स्थान प्राप्त है।




