चेरो जनजाति की स्वशासन समाजिक व्यवस्था खतरे में : आशुतोष सिह चेरो
Palamu : झारखंडी आदिवासी बचाओ सघर्ष समिती के प्रदेश अध्यक्ष आशुतोष सिंह चोरों ने कहा कि पलामू के चेरो जनजाति अपने स्वशासन व्यवस्था से भटककर आदिवासीयत से कोसों दूर हो गये। झारखण्ड मे 33 जनजातियों की अपनी अपनी सामाजिक व्यवस्था है, ठीक उसी प्रकार से चेरो जनजाति में गउवा बैगा की स्वशासन सामाजिक व्यवस्था है। जो कि विलुप्त होने के कगार पर है।
चेरो जनजाति मे स्वशासन समाजिक व्यवस्था विलुप्त होने का मुख्य कारण परम्परागत आदिवासी व्यवस्था से हटकर अन्य धार्मिक व्यवस्था का नकल करना है। 33 जनजाति सामुदाय मे शादि व्याह मे दहेज की प्रथा नही है। बल्कि बधु मूल्य की प्रथा है। शादी-ब्याह मे नेक के रूप मे दस्तूरी की चलन है। परन्तु वर्तमान समय मे अन्य गैर आदिवासी समाज का नकल करते हुऐ चेरो जनजाति शादी-ब्याह मे दहेज जैसे समाजिक कुरूति का प्रचलन को बढावा दे रहा है। जयमाल की प्रथा गउवा बैगा की अनुपस्थित परम्परागत स्वशासन व्यवस्था को खत्म कर दिया।

दहेज प्रथा ने हम चेरो जनजाति में गरीब अमीर की खाई खोद दी। चेरो जनजाति मे हर घर दहेज प्रथा से परेशान है। जहा मा, बाप, बेटी को शिक्षित करने पर सोचेगा। ठीक इसके विपरीत बेटी की शादी मे दहेज कैसे दे, यह सोचने पर विवश है।उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के स्वशासन व्यवहस्था मे दहेज का कोई स्थान नही है। परन्तु चेरो जनजाति इस पर कोई पहल नही कर पाना आने वाले पिढी के लिए खतरे का सबक है। पलामू के जनजाति अपने सैवंधानिक अधिकार कस्टमरी लॉ प्रथागत रूढ़िगत कानून’ मिला है, जो आदिवासी समुदाय जनजाति में सदियों से चली आ रही परंपराएं, रीति-रिवाज गउवा बैगा प्रथाएं पर आधारित कानून हैं, जो जनजाति अनादिकाल से इस कानून का पालन करते हैं। मौखिक इतिहास व परंपराओं पर है।
आर्टिकल 371 और पांचवीं/छठी अनुसूची वाले राज्यों के जनजातीय समुदायों के प्रथागत कानूनों सुरक्षा प्रदान करने मान्यताओं, परंपराओं और स्वशासन के नियमों को “विधि” द्वारा बल प्राप्त है। इसके बावजूद चेरो जनजाति अपन कस्टमरी ला का धजिया उडा रहे है और अपने आदिवासीत से दूर होकर अन्य समाजिक व्यवस्था को प्रधानता देकर आदिवासीयत एव कस्टमरी ला व्यवस्था से भटक चुके है।
चेरो जनजाति समय रहते अपने आदिवासी परम्परागत व्यवस्था में लौटे नही तो मुझे मजबूरन आने वाले पिढी के सुरक्षित भविष्य के लिऐ व्यवस्था को बचाने के लिए, इन सभी सामाजिक कुरितियों के खिलाफ मोर्चा खोलना पड़ेगा। इसलिए आप सभी से अनुरोध है कि समय रहते अपनी आदिवासीयत की ओर लौटे हमसभी अपने सैवंधानिक अधिकार कस्टमरी लॉ का पालन करे।




