जपला सीमेंट फैक्ट्री का इतिहास गौरवशाली, परन्तु अंत भी उतना ही दुखद और दर्दनाक

Palamu : पलामू जिले के हुसैनाबाद जपला में स्थित जपला सीमेंट फैक्ट्री (सोने वैली सीमेंट लिमिटेड) का इतिहास जितना गौरवशाली रहा है।इसका अंत उतना ही दुखद और दर्दनाक रहा। यह सिर्फ एक कारखाना नहीं था, बल्कि पूरे पलामू प्रमंडल और आसपास के इलाकों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ था।

फैक्ट्री की स्थापना और स्वर्णिम दौर की शुरुआत (1920-1921): ब्रिटिश काल के दौरान ब्रिटिश उद्योगपतियों और मार्टिन बर्न कंपनी के सहयोग से ‘सोने वैली सीमेंट लिमिटेड’ के नाम से इसकी नींव रखी गई थी। जपला की भौगोलिक स्थिति (सोन नदी, चूना पत्थर की खदानें और रेलवे नेटवर्क) इसके लिए मुफीद साबित हुई।
1922-23 से इसमें गुणवत्तापूर्ण पोर्टलैंड सीमेंट का व्यावसायिक उत्पादन शुरू हुआ। यहाँ का सीमेंट देश भर में प्रसिद्ध हुआ और कई बड़े राष्ट्रीय निर्माण कार्यों में इसका इस्तेमाल किया गया।फैक्ट्री परिसर में अपनी बिजली उत्पादन इकाई (लगभग 8 मेगावाट क्षमता), बड़ा अस्पताल, स्कूल, अधिकारियों व मजदूरों के लिए क्वार्टर और क्लब जैसी आधुनिक सुविधाएं थीं।
रोज़गार: फैक्ट्री और इससे जुड़ी बाौलिया (रोहतास) की चूना पत्थर खदानों में सीधे तौर पर 5,000 से अधिक मजदूर काम करते थे, जबकि अप्रत्यक्ष रूप से हजारों स्थानीय व्यवसायी और परिवार इस पर निर्भर थे।1980 के दशक के अंतिम वर्षों में प्रबंधन में ढिलाई, बिजली आपूर्ति में बाधा, कोयले की कमी और आंतरिक गुटबाजी के कारण फैक्ट्री घाटे में जाने लगी।

जुलाई 1992 के आसपास फैक्ट्री में उत्पादन पूरी तरह से ठप हो गया। देखते ही देखते जपला सीमेंट फैक्ट्री पर ताला लग गया और हजारों मजदूर एक झटके में सड़क पर आ गए।बंदी के बाद मजदूरों का वर्षों का बकाया वेतन और पीएफ अटक गया। बकाए के इंतजार और मुफ्लिसी में कई मजदूरों और पेंशनभोगियों ने दम तोड़ दिया।पिछले 3 दशकों में बिहार और झारखंड के हर विधानसभा व लोकसभा चुनाव में जपला सीमेंट फैक्ट्री को फिर से चालू कराना एक मुख्य राजनीतिक वादा बना रहा, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं हुई।लिक्विडेशन और कानूनी लड़ाइयों के बाद पटना उच्च न्यायालय के आदेश पर मई 2018 में बंद पड़ी इस फैक्ट्री की संपत्तियों की नीलामी प्रक्रिया की गई, जिसे स्क्रैप और परिसंपत्ति के रूप में लगभग 13.56 करोड़ रुपये में नीलाम कर दिया गया।​

आज जपला सीमेंट फैक्ट्री की ऐतिहासिक इमारतें, ऊंची चिमनियां और आवासीय क्वार्टर सिर्फ खंडहरों में तब्दील हो चुके हैं। जिस जगह से कभी पूरे क्षेत्र में रौनक हुआ करती थी, वह अब पलामू के औद्योगिक इतिहास का एक शांत और दुखद अध्याय बनकर रह गई है।

United Palamu

यूनाइटेड पलामू के डिजिटल टीम के द्वारा इस न्यूज़ को पूरी तरह से जांच परख कर तैयार किया गया है। उक्त टीम के द्वारा तथ्यों का गहन विश्लेषण करने के बाद न्यूज़ तैयार किया जाता है। न्यूज़ पोस्ट करने के पूर्व उसकी गहन समीक्षा की जाती है। तत्पश्चात न्यूज़ पोस्ट किया जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!