पांडू : थाना बुलाकर 16 वर्षीय नाबालिक के साथ मारपीट, हांथ हुआ फ्रैक्चर
संबंधित सिपाही को लगाई फटकार, मारपीट की नहीं थी जानकारी : थाना प्रभारी
Palamu : पलामू जिले के पाण्डु में घरेलू विवादों को सुलझाने और आम लोगों को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी जिन पुलिसकर्मियों के कंधों पर है, उन्हीं पर मारपीट और प्रताड़ना के आरोप लग रहे हैं। पलामू जिले के विभिन्न थाना क्षेत्रों से पुलिस की कथित मारपीट और दुर्व्यवहार की शिकायतें सामने आना पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।

पांडू थाना में 16 वर्षीय नाबालिग को थाने बुलाकर पीटने और उसका हाथ तोड़ने का गंभीर आरोप लगा है।पांडू थाना क्षेत्र के झरना कला निवासी शशि कुमार उर्फ अंगद ने पुलिस अधीक्षक को आवेदन देकर आरोप लगाया है कि पारिवारिक विवाद के मामले में पुलिस ने बिना निष्पक्ष जांच-पड़ताल और उनका पक्ष सुने उन्हें थाने बुलाया तथा मारपीट कर हिरासत में बंद कर दिया।इतना ही नहीं, आरोप है कि इसके बाद उनके 16 वर्षीय भतीजे दिवाकर कुमार को भी थाने बुलाया गया। वहां चौकीदार सुदर्शन पासवान की मौजूदगी में पुलिसकर्मी अनुज कुमार ने उसकी पिटाई की, जिससे उसका दाहिना हाथ टूट गया। पीड़ित पक्ष ने दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
एसपी की ओर से एक सप्ताह के भीतर कार्रवाई का आश्वासन दिए जाने की बात कही गई है।हालांकि, चौकीदार सुदर्शन पासवान ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि घटना के समय वह मौके पर मौजूद नहीं थे। वहीं, शिकायतकर्ता गुंजा देवी का कहना है कि गाली-गलौज के कारण उन्होंने थाने में आवेदन दिया था। थाना प्रभारी बिगेश कुमार राय ने भी शिकायत मिलने की पुष्टि करते हुए कहा कि मारपीट के समय वह थाने में मौजूद नहीं थे मामले को संज्ञान में लिया गया है।
आखिर थाने में न्याय मिलेगा या जख्म?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक घरेलू विवाद में 16 वर्षीय नाबालिग को थाने बुलाने की जरूरत क्यों पड़ी? यदि उसे बुलाया गया था तो किस आधार पर और किस प्रक्रिया के तहत? क्या पुलिस के पास किसी विवाद की जांच करने का तरीका केवल थाने बुलाकर पूछताछ करना और मारपीट करना ही रह गया है? यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह महज मारपीट नहीं, बल्कि पुलिस की जिम्मेदारी और कानून के प्रति जवाबदेही पर गंभीर सवाल होगा।पुलिस का काम विवाद सुलझाना है, विवाद को और गंभीर बनाना नहीं। किसी परिवार का घरेलू झगड़ा इतना बड़ा अपराध कैसे बन जाता है कि उसमें एक नाबालिग को भी कथित मारपीट का शिकार होना पड़े? शारीरिक चोट के साथ इलाज और अन्य खर्चों का आर्थिक बोझ भी आखिर पीड़ित परिवार ही क्यों उठाए?पलामू में ऐसे आरोपों की पुनरावृत्ति पुलिस प्रशासन के लिए आत्ममंथन का विषय है। वर्दी कानून से ऊपर नहीं है और थाना किसी की निजी अदालत नहीं। पुलिस अधीक्षक को केवल आश्वासन तक सीमित रहने के बजाय मामले की निष्पक्ष जांच, नाबालिग की मेडिकल रिपोर्ट, थाने के सीसीटीवी फुटेज और संबंधित अभिलेखों की जांच करानी चाहिए। दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि जनता के मन में यह भरोसा कायम रहे कि थाना न्याय पाने की जगह है, प्रताड़ित होने की नहीं।




